झारखंड में एक बार फिर भाषाई संग्राम भड़क उठा है। जेटेट परीक्षा में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल करने पर पेंच पूरी तरह फंस गया है और अब आखिरी फैसला मुख्यमंत्री के पाले में चला गया है।
नमस्कार, आप देख रहे हैं जेपी भारत लाइव। रांची में हुई पांच मंत्रियों की हाई-लेवल कमेटी की बैठक पूरी तरह बेनतीजा रही। दरअसल, बैठक में परीक्षाओं के मौजूदा भाषा पैटर्न पर गंभीर सवाल उठाए गए। समिति के कई सदस्यों ने इस नियम पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके तहत अभ्यर्थियों के लिए पंद्रह जनजातीय भाषाओं में से किसी एक का चयन करना अनिवार्य है। सदस्यों का तर्क है कि गढ़वा, पलामू और चतरा जैसे सीमावर्ती जिलों में जनजातीय भाषाएं बोलने वालों की तादाद न के बराबर है। ऐसे में इन जिलों के लाखों स्थानीय अभ्यर्थी बिना किसी गलती के परीक्षा की रेस से बाहर हो जाएंगे।
हैरानी की बात यह रही कि इस बैठक में कार्मिक और शिक्षा विभाग पिछली परीक्षाओं का कोई पुख्ता डेटा ही पेश नहीं कर पाए। इसी बीच, मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने कमेटी में जनजातीय और अल्पसंख्यक समुदाय के मंत्रियों को भी शामिल करने की मांग उठाकर नया ट्विस्ट ला दिया, जिसका फैसला अब मुख्यमंत्री को करना है।
बैठक में इन भाषाओं के पक्ष में दलील दी गई कि वर्ष 2012 और 2019 की परीक्षाओं में भी इन्हें जगह मिली थी, और मैथिली तो राज्य की दूसरी राजभाषा है। ऐसे में सीमावर्ती जिलों के लाखों युवाओं के हित में इन्हें हटाना ठीक नहीं है। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने बताया कि दो-तीन दिनों में इसकी विस्तृत रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी जाएगी।
इस विवाद ने सरकार के अंदरूनी मतभेदों को भी उजागर कर दिया है। एक तरफ जहां कांग्रेस और राजद इन भाषाओं को शामिल करने के पक्ष में हैं, वहीं झामुमो जल्दबाजी के बजाय फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री का अंतिम फैसला इस भाषाई विवाद की आग को शांत करता है या सूबे की राजनीति में कोई नया मोड़ लाता है। इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। खबरों से जुड़े रहने के लिए हमारे यूट्यूब और व्हॉट्सऐप चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। धन्यवाद।
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